नई दिल्ली। देश में एक बार फिर “आदिवासी डिलिस्टिंग” का मुद्दा चर्चा का केंद्र बनता जा रहा है। यह मांग मुख्य रूप से उन लोगों को अनुसूचित जनजाति (ST) की सूची से हटाने से जुड़ी है, जिन्होंने पारंपरिक आदिवासी धर्म और सांस्कृतिक पहचान छोड़कर ईसाई या इस्लाम जैसे अन्य धर्म अपना लिए हैं। डिलिस्टिंग के समर्थकों का तर्क है कि धर्म परिवर्तन के बाद ऐसे लोगों को अनुसूचित जनजाति आरक्षण और उससे जुड़े संवैधानिक लाभ नहीं मिलने चाहिए।
यह विवाद कोई नया नहीं है। इसकी जड़ें 1960 के दशक तक जाती हैं और समय-समय पर यह मुद्दा सामाजिक तथा राजनीतिक बहस का कारण बनता रहा है। वर्तमान में भी आदिवासी समाज के भीतर इस विषय को लेकर स्पष्ट रूप से दो मत दिखाई देते हैं।
एक पक्ष का कहना है कि अनुसूचित जनजाति की पहचान केवल जातीय नहीं, बल्कि पारंपरिक संस्कृति, रीति-रिवाज और जीवन पद्धति से जुड़ी हुई है। ऐसे में धर्म परिवर्तन के बाद आरक्षण का लाभ जारी रखना मूल आदिवासी समुदायों के अधिकारों को प्रभावित करता है।
वहीं दूसरा पक्ष इस मांग का विरोध करते हुए कहता है कि आदिवासी पहचान केवल धर्म से तय नहीं होती। उनका तर्क है कि धर्म परिवर्तन के बावजूद सामाजिक, आर्थिक और भौगोलिक चुनौतियां समाप्त नहीं हो जातीं, इसलिए आरक्षण जैसे संवैधानिक संरक्षण बने रहने चाहिए।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह विषय केवल धार्मिक नहीं, बल्कि संवैधानिक, सामाजिक और राजनीतिक पहलुओं से भी जुड़ा हुआ है। यही कारण है कि आदिवासी डिलिस्टिंग को लेकर देशभर में लगातार बहस और चर्चाएं जारी हैं।

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